सोमवार 22 जून 2026 - 17:01
आशूरा, मौएज़ा और इतमाम ए हुज्जत करने का मैदान था

हौज़ा के एक वरिष्ठ विद्वान ने इमाम हुसैन (अ) के आशूरा की जंग से पहले दिए गए खुत्बा का ज़िक्र करते हुए कहा कि सय्यद उश शोहदा (अ) ने अंतिम क्षणों तक भी दुश्मन को मार्गदर्शन देने का प्रयास किया और उन्हें सत्य सुनने तथा न्याय के साथ व्यवहार करने की दावत दी। यह उनका “इतमाम ए हुज्जत करना” था। यह व्यवहार दर्शाता है कि उपदेश और मार्गदर्शन अल्लाह के चुने हुए बंदों की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नासिर रफ़ीई ने मुहर्रम की सातवीं रात, जमकरान मस्जिद में मजलिस को संबोधित करते हुए कहा कि आशूरा की घटना को समझने का सबसे अच्छा तरीका इमाम हुसैन (अ) के खुत्बो और मौएज़ात का अध्ययन करना है, जो मक्का से कर्बला तक दिए गए थे, क्योंकि इन्हीं से उनके आंदोलन का उद्देश्य स्पष्ट होता है।

उन्होंने कहा कि युद्ध शुरू होने से पहले इमाम हुसैन (अ) ने दुश्मन सेना से कहा: “मेरी बात सुनो और मुझे मारने में जल्दबाज़ी न करो, ताकि मैं तुम्हें मौएज़ा कर सकूँ और तुम पर अपनी हुज्जत तमाम कर सकूँ।”

हौज़ा के शिक्षक ने कहा कि इमाम हुसैन (अ) ने इस भाषण में दुश्मन के सामने दो रास्ते रखे: यदि वे सत्य को स्वीकार कर लें तो उन्हें सफलता मिलेगी, और यदि न स्वीकार करें तो इतमाम ए हुज्जत होने के बाद वे अपना निर्णय स्वयं ले सकते हैं।

जामिया अल-मुस्तफा अल-आलमिया के सदस्य ने कहा कि इस भाषण में इमाम हुसैन (अ) ने कुरआन की दो आयतों का उल्लेख किया, जिनमें हज़रत नूह (अ) से संबंधित शिक्षाएँ और अल्लाह पर भरोसा शामिल है। इससे यह स्पष्ट होता है कि उन्हें शहादत का भय नहीं था और वे अपना दायित्व केवल लोगों को मार्गदर्शन देना मानते थे।

उन्होंने कहा कि इस खुत्बा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश “मौएज़ा” की अहमियत है। इमाम हुसैन (अ) ने अपने अंतिम क्षणों में भी दुश्मन को सही मार्ग दिखाने की आशा नहीं छोड़ी। यह हम सबके लिए एक बड़ा सबक है कि हमें कभी भी उपदेश और नसीहत के प्रभाव से निराश नहीं होना चाहिए।

इस विद्वान ने अमीरुल मोमिनीन अली (अ) के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि “अपने दिल को उपदेश के माध्यम से जीवित करो।” उन्होंने कहा कि कभी-कभी एक वाक्य, एक आयत या एक नसीहत इंसान की पूरी ज़िंदगी बदल सकती है, जैसा कि इतिहास में कई लोगों के साथ हुआ।

उन्होंने इस्लाम के इतिहास से उदाहरण देते हुए मिर्ज़ा जहाँगीर खान क़शक़ाई और फ़ुज़ैल बिन अयाज़ जैसे व्यक्तियों के परिवर्तन का उल्लेख किया और कहा कि सच्चे दिल से दी गई नसीहत इंसान की किस्मत बदल सकती है।

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन रफ़ीई ने आगे कहा कि जंग-ए-सिफ़्फ़ीन में भी अमीरुल मोमिनीन अली (अ) युद्ध को तब तक टालते थे ताकि शायद दुश्मन सेना में से कोई व्यक्ति मार्गदर्शन प्राप्त कर ले। यही तरीका इमाम हुसैन (अ) ने भी आशूरा के दिन अपनाया।

अंत में उन्होंने कुरआन और हदीस के अनुसार प्रमुख उपदेश देने वालों का उल्लेख करते हुए कहा कि अल्लाह, पवित्र कुरआन, मृत्यु, जीवन के अनुभव, माता-पिता, अहलेबैत (अ) और स्वयं मनुष्य का अंतरात्मा—ये सभी इंसान के लिए उपदेश और जागृति का माध्यम हैं। यदि इंसान विचारशील हो, तो वह जीवन की हर घटना में मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता है।

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